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कव्यांक

जब रास्तों में मेरे सिर्फ नाकामियां हाथ लग रही थीं;
एक इत्तेफाक़ था शायद जो मुझे तुम मिले।

अकेले ही काट रहा था सफ़र, अकेले ही गुज़ार होती ज़िन्दगी;
शायद भाग्य में लिखा था कुछ ज़्यादा मेरे लिए, जो ऐसी तन्हाई में मुझे तुम मिले।

हर मोड़ पर आकर ठोकरें खाने की आदत हो चली थी,
हर कदम जैसे दर्द का कोई झरना सा बह रहा था;
उस दुख-दर्द के मौसम में जैसे मुस्कुराहट की किरन दिखी,
पलकें झुका कर देखा जब मुझे तुम मिले।

मंज़िल का पता है इतना, की राहों के ख़त्म होने पर मिलेगी कहीं;
उस निशान तक के सफ़र में हमसफ़र की तरह मुझे तुम मिले।

ना मुझे कोई अता पता, ना ही तुम्हे कोई खबर,
एक अनदेखी मंज़िल की अनजानी राहों पर,
एक अजनबी से दोस्त मुझे तुम मिले।

अब जब वो आखरी मोड़ है नजदीक, लग रहा पोहुंचा हूं मंज़िल के बोहोत करीब;
तो मुड़कर देखने पर लग रहा, मंज़िल से भी हसीं मुझे हमराही तुम मिले।

जैसे नदियों की धारा से कहीं खूबसूरत होता है नदियों का किनारा,
एक प्यासे को किनारे की तरह थे मुझे तुम मिले।

एक सूखी दोपहर में बारिश की तरह मुझे तुम मिले।
तारों तक की छलांग में कहीं चांद ना छूट गया हो मुझसे,
मेरे किसी गलती से वो दोस्त रूठ ना गया हो मुझसे;
सांसों की आदत लगी हो जैसे, कुछ उसी तरह लगी दिल की लगी जब तुम मिले।

मंज़िल पाकर भी क्यों कुछ हाथ ना लगा महसूस होता रहा,
खुशियों की तरफ घूमकर देखा तो तुम मिले।
अब तक शायद जो ढूंढ़ रहा था वो मेरे साथ ही हर वक़्त चल रहा था;
जब मुकाम हासिल किया, मेरी धड़कनों में तुम मिले।

था ये एक छोटा-सा सफ़र, मगर मन को रिश्ता हमारा बरसों पुराना लगे;
मेरी आरज़ू थी जो उससे भी कहीं अनमोल मुझे तुम मिले।

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