यार की दुआ

अर्ज़ किया है,
मुलाइजा फरमाइए:

कि, ये जंग तो हम कबकी हार चुके हैं;
इन जुल्मों के आगे हथियार, बस डाल ही चुके हैं।

संसार की ये डोर भी कब की काट चुके होते,
सबकुछ कब का पीछे छोड़ चुके होते;
वो मेरे यारों की दुआएं हैं जो सांसों में बसी हुई हैं, जिनकी बदौलत अभी ये प्राण बाकी हैं।
उनसे लिए हुए बोहोत से एहसान बाकी हैं।।

7

Categories:

Tagged as: , , , ,

1 reply »

Leave a Reply